को डराने की कोशिश की, ताकि 2-3 घंटे की क्लास से डर के वो खुद ही चली जाए। पर वो आखिर मेरी माँ थी। ऐसे थोडी होता है। सुप्रिया के पास भी यही वाला फोन है। उसको नहीँ करना पडा कोई कॉर्स। बेवकूफ मत बना। पांच घंटे की फुरसत निकाल के मुझको माँ को ए टू जेड सब कुछ सिखाना पडा। फिलहाल बचने का एक ही रास्ता था। मैं तंग आ गए थी, इन किस्सो मेँ ब्लड डोनेशन से। उस घर का चूल्हा नहीँ जला, टीवी खामोश रहा, पापा को बाहर से खाना मंगवाना पड़ा, भइया देर रात तक दबे पॉव आ कर माँ को सामने पा कर भी बच गए। डांट ना खाने की वजह से उसको भी नींद नहीँ आई। मुझको लगा कि यह एक रात की कुर्बानी है, बाकी दिन तो ठीक ही बितने वाले है । अगले दो दिन माँ ने मुझको बिल्कुल परेशान नहीँ किया। जितना मैंने सिखाया सब कर कर के देख लिया। सबकी आदि हो गई। हर गुरुवार को बन-ठन के किर्तन के लिए जाया करती थी। वहाँ इनकी जैसी और भी ओरतें थी। लेकिन मेरी माँ उन सब में सबसे पॉप्यूलर हो गई थी। ये मातायें डाउनलोड किया हुआ भजन गाया करती थी, जिनका सबसे भारी स्टॉक मेरी माँ के पास ही था। भजन मंडली की स्पेशल रिंगटोन भी सेट थी "मेया मोरे अंगना दरस दिखा।" माँ अब सोशल नेटवर्किंग साइट पर भी थी। ना जाने किस-किस जमाने की कौन-कौन सी सहेलियाँ मिल गई थी। उनको हर 1-2 घंटे के बाद किसी न किसी सहेली कॉल आ रहा था। कभी कभार उनका फोन उठाने की कोशिश करती तो, किचन से अचानक प्रकट होकर फोन हाथ मेँ ले लेती। जैसे की मैँ उसे तोडने वाली थी। "मेया मोरे आँगन" सुन सुन के दिमाग ऐसा हो गया था कि बिना फोन के बजे भी यही सुनाई देता था। फ़ोन के बजते ही माँ के चेहरे की पूरी बत्तीसी दिखा जाती थी। बहरहाल मेरी सारी हरकतेँ बंद थी। जिनसे माँ को हमेशा से शिकायत रहती थी। शिकायत कैसे करती? मेरी माँ वही सब तो करने लगी थी। सहन के हद तब हुई जब पापा-भइया के ना रहते, एक दिन घर की घंटी बजी। अंजलि शर्मा। एक डिलीवरी बॉय था। पार्सल है उनका। मुझे हैरानी हुई। माँ के पास उनके तो नाम की चिठ्ठी भी नहीँ आई थी पिछले दस सालो मेँ। पार्सल देखा तो सही मेँ माँ का नाम था और पता भी ठीक था, ज्यादा भारी नहीँ था। मुझको उत्सुकता हुई कि इसमेँ क्या है। मैंने पहले सोचा पार्सल खुद ही खोल लूँ। फिर लगा नहीँ माँ कही बिगड़ ना जाए। मैने उनको आवाज लगाई और पार्सल के बारे मेँ बताया। सुनते ही वो घरेलू मंदिर के कन्हेया को अकेला छोड की सरपट तोडते हुए आ गए।अरे ये तो सच मेँ आ गया। क्या है मम्मा? माँ ने मेरी आवाज नहीँ सुनी। बस उसी उत्सुकता उसको चिर-फाडने मेँ लग गए। जो उस मनहूस फोन के समय फाड़ते हुए देखी थीं। आज उनको चाकू की भी जरुरत नहीँ थी। खुलने पे रहस्य भी खुल गया एक सारी थी मेहंगी, कीमती और बेहद सुंदर।

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