फ़ोन का नाम ले के देखे मेरी माँ के सामने। हाथ मेँ देखते ही करछी हवा मेँ घुमाना शुरु। रिचार्ज करवाने के नाम से तो मेरा फोन भी कॉपता था। बिना वाइब्रेशन मोड के रहे। अब उनको मैं कैसे समझाऊँ की आजकल यह बडी जरुरी चीज हो गई है और मेरा नसीब भी अजीब फोन ज्यादा बजे भी तब ही जब माँ बगल मेँ हो। एक आम छोटे शहर की २३ साल की लडकी थी मैं। मेरी जिंदगी का जादातर वक्त घर मेँ ही गुजरता था। स्कूल की पढ़ाई के दौर खत्म हो चुका था। डिस्टेंस एजुकेशन कर रही थी मेैं, इसलिए लोकल कॉलेज सेंटर पे कभी कभी जाना पडता था। लेकिन बहुत कम। इसलिए माँ के नजरो से बचके फोन पर गप-शप करनी पड़ती थी। अगर 5 मिनट भी बात करते पकडे गए ना तो माँ आकर एक ही डायलॉग बोला करती थी "हे भगवान, इस लडकी की जुबान पर कौन सा ग्रह सवार रहता है, कितने घंटे फोन पे बात करती है तू, कान खराब हो जाएंगा। सारा दिन कभी टीवी, कभी कंप्यूटर, कभी फोन। बहरहाल मैं दुबक्ती तब थी जब माँ का मूड जादा खराब होता था। माँ इस मामले मेँ बहुत ही मतो से विजय थी क्यूंकि एक बार वो इन सब मुद्दो पर चिल्लाना शुरु कर देँ तो पापा भइया भी अपने अपने स्टाईल मेँ भाषणबाजी करने लग जाते। दोनो तो बस मौके की तलाश मेँ रहते थे। हरदम लेकिन माँ को दिन भर कहाँ उनका बहुमत मिलता। जादातर तो घर में हम माँ बेटी ही रहा करते थे। तब तो वह चलाने की फॉर्मेलिटी पूरी करके दोपहर के 3-4 घंटे की नींद मारने चली जाती थी। जिंदगी ऐसे ही चलती रहती तो कितना अच्छा होता। भले ही माँ मुझ पे जिन कारणो से चिल्लाती, मुझे उनकी तीखी आवाज़ की आदत हो गई थी। अब आजकल उनको मुझे पूरे घर मेँ घूम घूम के बात करनी पडती है। ये फसाद उस दिन शुरु हुआ जब माँ का जन्म दिन आया। अब मैँ खुद को कोसू या पिट। यही समझ नहीँ आता। क्यूंकि पापा को उससे पहली वाली रात को ये याद दिलाने वाली मैं ही थी। पापा को पिछले २२ साल का रिकॉर्ड है माँ का जन्म दिन की कभी याद नहीँ रखा। माँ के लिए अगले दिन तब तक नॉर्मल था, जब तक उनको रसोई के गैस चूल्हे पर चमकीली रंगीन पानी मेँ डिब्बा नहीँ दिखा। आयशा, देख तेरे पापा मेरे लिए कुछ लाये है। मुझे नहीँ लगा था मेरी दी हुई ख़बर का इतना और ऐसा असर देखने को मिलेगा। पापा सुबह रुक नहीँ सकते थे। इसलिए जाने से पहले चुपके से रसोई मेँ रख कर चले गए होंगे। "सो क्यूट" माँ के चेहरे पे बच्चो जैसी मुस्कान तेरी मुझे उस वक्त माँ पर इतना प्यार आया कि उनको कस कर चूम लेने का मन कर रहा था। लेकिन सारा ध्यान तो उस डिब्बे पर था। मेरे हाथ मेँ सिर्फ एक पल के लिए डिब्बा दे कर, तुरंत इसको रसोई मेँ ले गई और चाकू से खोलने लगीं। मेरे रसोई तक पहुँचते पहुँचते पन्नी के फटने की आवाज बंद होती गई थी। जब मैंने रसोई मेँ जाकर तो माँ के हाथ मेँ एक चम-चमाता हुआ लाल रंग का मोबाइल फोन था। वो मुस्कुरा भी रही थी ओर शरमा भी रही थी।
To Be Continue...

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