मेँ सभी के पास फोन था। लेकिन माँ को हमेशा नंबर मिला कर या कॉल रिसीव करके देना पडता था। माँ को ऐसे घबराते देख मैंने धीरे से आगे बढ़ी और समझाते हुए बताने लगी की कॉल कैसे रिसीव करना है। पापा स्मार्टफोन खरीद लाए थे, सबसे पहले मुझको ये शिकायत हुई कि माँ इस को चला पाएंगे? फिर फिकर को किनारे रख कर, मैंने माँ से कॉल रिसिव कराया। फोन पे पापा थे। माँ के गिरते एक आंसू की बूंद से मुझे अंदाजा हो गया था कि पापा को जन्म दिन की शुभकामनाएँ दे रहे थे। माँ ने भी आंसू से घुली हुई आवाज से जवाब दिया। "थैंक यू" बडा ही इमोशनल सीन था ना, बस यहीँ तक था। आगे ट्रैजडी ही ट्रैजडी हैं। जो माँ इतने सालो से चिल्ला चिल्ला के नहीँ कर पाए थीं। वो पापा के एक गिफ्ट कर चुका था। एेसे ही घर मेँ किसी ओर सेल फोन के साथ तो सोतेला व्यव्हार होता। लेकिन इसके साथ नहीँ हुआ। ये तो माँ का गिफ्ट था। इसको दिन भर अपने से लगाए रखती थी समझ मेँ नहीँ आता था कि अब कहाँ गए वो नफरत। वो और उनका गिफ्ट संग रह जाते तो मुझको कोई दिक्कत नहीँ थी, लेकिन यहाँ माँ को फोन चलाना सिखाए कौन? जी हाँ बचती मैं ही थीँ। अब माँ की डांट की जगह आयशा फोन आया, कैसे उठाऊँ? आयशा इसमेँ मेसेज कैसे करते हैं।अरे इस में गाने भजन सब बजते हैं। देख तो, अरे ये तो फोटो भी खींचता हैं। ओए इसमेँ तो रिकॉर्डिंग भी होती है। आयशा, अरे ये तो, अरे इसमेँ तो, आयशा ये कैसे? आयशा इसमेँ क्या? बाप रे बाप!! मेरी माँ को मेरे माथा चबाने लग गई थी। ना तो मैम किसी से फोन ही बात कर पा रही थी और ना ही ऑनलाइन चैट। नहीँ शॉपिंग कुछ नहीँ। किस्तों में माँ मेरा खून चूसने लग गई थी। अब तो दोपहर मेँ सोती भी नहीँ थी। बस उसी फोन मेँ कछर-पचर करती रहती थी। पापा का दिया हुआ कुछ ज्यादा ही बढ़िया निकल गया था। इतना कि पापा कोई अंदाजा नहीँ था रोज सुबह नाश्ते के लिए उन को पकड़ पकड़ के सुनाने वाली उनकी बीवी से उनको नाश्ते की भीख मांगी पढ़ती थी। भइया को घर से कोई सरोकार ही नहीँ था। घर का सिन यह था कि पापा सुबह गिड-गिडाते हुए ये कहते "अंजलि, चाय तो दे दो।" वो कहती किचन की पतली मेँ होगी ले लो। माँ फोन नहीँ देख कर बोल दिया करती थी। पतली से उतार भी नहीँ नहीँ हैं। गरम करके तो दे दो ना। एक तो फोन समझ नहीँ आ रहा है, ऊपर से तुम। गर्म ही हैं। अभी तो बनाई है। ले लो ना। बेचारे पापा सोच रहे थे कि २२ साल से जन्मदिन भूलते थे। वहीँ सही था। अगर इस सिन के बीच मेँ कही कभी मैं दिख जाती तो पापा नजरो से मुझको कह जाते "दिखक्कार हैं"। फिर एक दिन माँ अपने फ़ोन के मुखडे को देखते हुए कुछ समस्या लेकर आए, "आयशा जो फोन में ये दुनिया का गोल गोल निशान बना है, इस से क्या होता है?" दिमाग मेँ दो शब्द गूंजे "मर गए!!"
- Get link
- X
- Other Apps
Comments
Post a Comment